केन्‍द्रण् राज्‍य वित्‍तीय संबन्‍ध बनाम जीएसटी: समस्या एंव चुनौतिया

 

Dr. P.K. Singh1, Mahesh Pandey2, Priyesh chaurasiya3, Akash Verma4, Krishan Kanhaya5

1Assistant Prof., Department of Economics, University of Allahabad, Allahabad.

2Research Scholar, Department of Economics, University of Allahabad, Allahabad.

3,4,5Research Scholar, Department of Economics, University of Allahabad, Allahabad.

*Corresponding Author E-mail: pradeepbpo1990@gmail.com, maheshpandey344@gmail.com

 

ABSTRACT:

भारतीय राजनीतिक स्‍तर पर केन्‍द्र व राज्‍यों के स्‍तर पर अलग.अलग दलों की सरकारें होने पर अनुदान संबरन्‍धी विवाद देखने को मिलता है। ऐसी स्थिति में केंन्‍द्रीय सरकार का प्रयास होता है कि स्‍वैच्छिक अनुदान अधिक से अधिक प्रदान किया जाये और संवैधनिक अनुदान नाममात्र का प्रदान किया जाये ताकि विपक्षी दलों से शसित राज्‍यों में सरकार की लोकप्रियता को कम किया जा सके और अगले चुनाव में केन्‍द्रीय सत्‍तधारी दल की सरकार कों राज्‍य में स्‍थापित किया जा सकेए जबकि राज्‍य में स्‍थापित दल अपनें वादो को पुरा करने तथा भविष्‍य में अपनी सरकार को बनायें रखने हेतु राज्‍यस्‍तरीय योजनाओं को वरीयता प्रदान करता है। इसी कारण राज्‍य सरकार द्वारा संवैधानिक अनुदानों की मांग अधिक से अधिक किया जाता हैए क्‍योकि इसको खर्च करने की स्‍वतंत्रता होती हैए जो संघ बनाम राज्‍यों के विवाद को जन्‍म देता है।

 

KEYWORDS:  जीएसटीए बनाम

 

 


प्रस्तावना %&

स्वतंत्रता प्रात्ति के बाद जब भारतीय संविधान का निर्माण हुआ तो भारतीय संविधान निर्माताओं ने एक मजबूत संघीय सरकार की कल्‍पना थी। इस कल्‍पना को आर्थिक रूप से साकार करने के लिए अनेक बड़े करो जैसे निगम करए आयकरए उत्‍पाद शुल्‍क इत्‍यादि को केन्‍द्रीय सरकार के पक्ष में रखाए ताकि आर्थिक रूप से राज्‍यो की संघीय सरकार पर निर्भरता बनी रहे तथा भारतीय एकता और अखण्‍डता प्रभावित न हो। इस उद्देश्‍य की प्राप्ति हेतु भारतीय सेविधान के अनुच्‍छेदण्280 के अन्‍तर्गत वित्‍त आयोग का प्रावधान किया गया जो संघीय सकल कर उग्रही में राज्‍यो के हिस्‍सों के बटवारें के संदर्भ में अपना सुझाव देता है।

 

संविधान में वर्णित राज्‍य के नीति निदेशक तत्‍वों के लक्ष्‍यो की प्राप्ति हेतु एवं राज्‍यों के योजनागत तथा गैर.योजनागत लक्ष्‍यों को पुरा करने के लिए भी संधीय व्‍यवस्‍था के समान लक्षणो के अनुरूप संघ से राज्‍यों को सहायता अनुदान दिया जाता हैए क्‍योकि भारतीय परिप्रेक्ष में राज्‍य कनाडा की व्‍यवस्‍था के समान अधिक आर्थिक शक्तियों का अभ्‍यास नही करते है। अनुदान प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते है.

 

1ण्स्‍वैच्छि‍कध्वैधानिक अनुदान ;अनुण्275द्ध

२ण्संवैधानिक अनुदान ;अनुण्280द्ध

 

स्‍वैच्‍छिक अनुदान केन्द्रिय कार्यक्रमों के संचालन हेतु राज्‍यों को दिया जाता है। इसके लिए नीति आयोग जैसी संविधानेत्‍तरए सलाहकारीए नियोजनकर्ता संस्थाओं से सलाह भी लिया जाता है। ध्‍यान देने योग्य है कि ऐसे अनुदानों को खर्च करने की स्‍वतंत्रता राज्‍यों को नही होती है। राज्‍य सरकारें अपने विशिष्‍ट कार्यक्रमों के लिए ऐसें अनुदान राशि का प्रयोग नही कर सकती है। जबकि संवैधानिक अनुदान ;अनु.282द्धए वित्‍त आयोग ;अनु.280द्ध की सलाह पर दिया जाता है और इससे राज्‍यों की संचित निधि बनाया जाता है। राज्‍य सरकारे अपने विशिष्‍ट कर्यक्रमों के संचालन हेतु राज्‍य नियोजन अधिनियम को पारित कर ऐसे अनुदान को खर्च कर सकती है।                   

 

भारतीय राजनीतिक स्‍तर पर केन्‍द्र व राज्‍यों के स्‍तर पर अलग.अलग दलों की सरकारें होने पर अनुदान संबन्‍धी विवाद देखने को मिलते है। ऐसी स्थिति में केंन्‍द्रीय सरकार का प्रयास होता है कि स्‍वैच्छिक अनुदान अधिक से अधिक प्रदान किया जाये और संवैधनिक अनुदान नाममात्र का प्रदान किया जाये ताकि विपक्षी दलों से शसित राज्‍यों में सरकार की लोकप्रियता को कम किया जा सके और अगले चुनाव में केन्‍द्रीय सत्‍तधारी दल की सरकार कों राज्‍य में स्‍थापित किया जा सकेए जबकि राज्‍य में स्‍थापित दल अपनें वादो को पुरा करने तथा भविष्‍य में अपनी सरकार को बनायें रखने हेतु राज्‍य स्‍तरीय योजनाओं को वरीयता प्रदान करता है। इसी कारण राज्‍य सरकार द्वारा संवैधानिक अनुदानों की मांग अधिक से अधिक किया जाता हैए क्‍योकि इसको खर्च करने की स्‍वतंत्रता होती हैए जो संघ बनाम राज्‍यों के विवाद को जन्‍म देता है।

 

इस प्रकार भारत में केन्द्रण् राज्य वित्तीय सम्बन्धो के सन्दर्भ में जीएसटी की आवश्यकताओं को निम्न बिन्दुओ के रुप में स्पष्ट किया थाः

 

केन्‍द्र.राज्‍य संबन्‍धो में जीएसटी की आवश्‍यकतारू

१ण्        संघ और राज्‍य स्‍तर पर दोहरे कर की व्‍यवस्‍था समाप्‍त होने से वस्‍तुओं के मूल्‍य मे कमी होगी तथा एक राष्‍ट्र एक कर की संकल्‍पना को साकार किया जा सकता है।

  

२ण् भारत में कर सुधार के दो प्रमुख उद्देश्‍य रहे है.

कण् कम कर दर

खण् विस्‍तृत कर आधार

जीएसटी से कर आधार के विस्‍तृत होने से सकल कर राजस्‍व में वृद्धि होगी।

 

३ण् जीएसटी के द्वारा विश्‍व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में किया जा सकता है।

 

४ण् स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद कृषि एवं सेवा कर को कर दायरे से मुक्‍त रखा गया था। जीएसटी के द्वारा सेवा क्षेत्र को विस्‍तृत रूप से कर दायरे में लाया जायेगा।

 

५ण् 1991 में एलपीजी माडल को अपनाये जाने तथा सब प्राईम क्राईसेस तथा यूरोजोन क्राईसेस ने अर्थव्‍यवस्‍था के समक्ष सक नई समस्‍या वित्‍तीय अस्थिरता को जन्‍म दिया है। जीएसटी इस समस्‍या से निपटने में एक निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।

 

६ण् तारापोरे कमेटी ;प्रथम एवं द्वितीयद्ध ने भारतीय रूपये को पूंजी खाते पर पूर्णतरू परिवर्तनीय बनाने के लिए यह सुझाव दिया था कि वित्‍तीय क्षेत्र को एक विनियमक  इकाई के अन्‍तर्गत रखा जाए और कर व्‍यवथा में व्‍यापक सुधार किया जायए जीएसटी इस दिशा में एक कारगर उपाय साबित होगा।

 

७ण् भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में गैर वित्‍तीय संस्‍थाओं के कार्यो को भी इससे नियंत्रित किया जाएगा जिससे हमारी मौद्रिक कार्यप्रणाली की प्रभावशीलता और भी प्रभावशाली होगी।

 

८ण् राजकोषीय नीति के अन्‍तर्गत अर्थव्‍यवस्‍था में अतिरिक्‍त साख प्रवाह को विनियमित किया जा सकता है।

 

उपरोक्‍त इन सभी कारणो से देश में यह चर्चा प्रारम्‍भ

हो गई कि अब करो की संरचना में सुधार किया जाए तथा भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को द्वितीय आर्थिक सुधारो के युग में प्रवेश करने के लिए जीएसटी जैसे प्रावधानो को वरीयता दी जाए जिससे केन्‍द्र.राज्‍य संबन्‍धो को पुनरू नए रूप में परिभाषित किया जा सके।

 

संघात्मक व्यवस्था का मौलिक सिद्धान्‍त ही यह है कि ऐसा कोई भी नियम या कानून नहीं बनाया जा सकता जिससे केंन्‍द्र तथा राज्‍यों में मतभेद की स्थिति उत्‍पन्‍न हो। वर्तमान में अब जब जीएसटी का मुद्दा लें तो 1 जुलाई के पहले केंन्‍द्र ओर राज्‍यों में कर प्रणाली को लेकर अनेक गतिरोघ उत्‍पन्‍न होता रहा है तथा कर की जटिलता को लेकर परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। राज्‍यों के साथ इसी गतिरोध को दूर करने तथा कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए देश में जीएसटी को लागू किया गया। एक कर एक देश का नारा दिया गया जिससे देश संगठित होकर विकास की ओर अग्रसर हो।

 

विश्व स्तर पर भारत को चौथी शक्तिशाली उभरती हुई अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में जिस तरह   से देखा जा रहा हैए इसको साकार रूप देने के लिए आर्थिक क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण कदम उठाना बहुत आवश्‍यक था। देश की अर्थव्‍यवस्‍था की गति को तेज करने तथा धारणीय विकास को प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से हाल ही में वस्‍तु एवं सेवा कर को लागू किया गया है। जीएसटी लागू करने वाला भारत विश्‍व में अकेला देश नहीं है। इससे पहले कई देशों ने अपने यहां जीएसटी व्‍यवस्‍था को अपनाया है और उनका प्रयोग सफल रहा है। सर्वप्रथम फ्रांस ने वर्ष 1954 में अपने यहां जीएसटी लागू किया और उनकी सफलता को देखकर अन्‍य देशों ने भी कर सुधार के रूप में जीएसटी को लागू किया।

 

गौरतलब है कि भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में कर सुधार के उद्देश्‍य से जीएसटी लागू करने को इसलिए महत्‍वपूर्ण माना जा रहा है क्‍योकि भारत विशाल देश के साथ.साथ एक उपमहाद्वीप भी है और यहां जीएसटी लगभग सभी राज्‍यों में लागू हो गया है। ऐसी विशाल संघीय व्‍यवस्‍था विश्‍व के अन्‍य देशों में कहीं नहीं है इस दृष्टि से यहां जीएसटी लागू होना अपने आप में एक महत्‍वपूर्ण बात है।

 

भारत की इन्‍हीं विशेषताओं को देखवे हुए स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे यहां मिष्श्रित अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाया गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाया गया। इसके बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार की दृष्टि से वर्ष 1991 में उदारीकरण भी लाया गया। तब कुछ हद तक आशा व्‍यक्‍त की गयी थी कि सरकार आर्थिक क्षेत्र में बड़े बदलाव की ओर उन्‍मुख होगी और बदलाव आया भी। वर्तमान परिदृश्‍य में जब हम देखवे हैं कि भारत में कारोबार करने के तरीके में परिवर्तन आया है। इसके परिणामस्‍वरूप पिछले वर्षो में देश के भीतर व्‍यापार करने की जरूरतें भी काफी हद तक बढ़ गयी हैं। पहले जो व्‍यापार या उद्योग किये जाते थेए उनके लिए वैश्विक बाजार में प्रतिस्‍पर्धी होना उतना आवश्‍यक नहीं था क्‍योकि उस समय लाइसेंस राज था। अब स्थिति ऐसी आ गयी है कि वैश्विक स्‍तर पर हमारे उद्योग के लिए प्रतिस्‍पर्धी होना आवश्‍यक है। इसी संदर्भ में अर्थव्‍यवस्‍था को अधिक कुशल और उत्‍पादक बनाने के साथ.साथ एक आर्थिक भारत के निर्माण की परिकल्‍पना के उद्देश्‍य से 1 जुलाई को देश में जीएसटी लागू किया गया है। नीति आयोग संचालन समिति की तीसरी बैठक में प्रधानमंत्री ने अपने उद़घाटन भाषण में कहा कि वस्‍तु एवं सेवा कर पर सहमति भारतीय संघीय ढांचे की ताकत और संकल्‍प को दर्शाती है और एक देश की एक भावनाए एक आकांक्षाए एक संकल्‍प को दर्शाती है।

 

जीएसटी लाने की प्र‍क्रिया कई चरणों में रही लेकिन इतने बडे़ कर सुधार को साकार रूप देने में कुछ राजनीतिक अड़चन भी आयी। कर प्रणाली के लिए कुछ संविधान संशोधन विधेयक भी लाये गये वर्ष्‍ 2011 में 115वां विधेयक पर संसद में काफी विचार.विमर्श किया गया लेकिन समय की मांग कुछ और थी उस वक्‍त लोकसभा भंग हो गयी और अंततोगत्‍वा यह विधेयक भी निरस्‍त हो गया। दिसंबर 2014 में पुनरू वस्‍तु एवं सेवा कर पर 122वां विधेयक लाया गया और चर्चा.परिचर्चा होने के बाद मई 2015 में लोकसभा से पास भी हो गया। संविधान के भाग 20 में अनुच्‍छेद 268 संविधान संशोधन की शक्ति संसद को प्रदान करता है जिसमें विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करना अनिवार्य हे। इसके लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है जिसमें सदन में कुल सदस्‍य संख्‍या के आधार पर उपस्थित सदस्‍यों के दो तिहाई मतों द्वारा होना चाहिए। इसके साथ ही विधेयक दोनों सदनों निम्‍न तथा उच्‍च सदन में अलग.अलग पारित होना आवश्‍यक है। इस आधार पर वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक को राज्‍यसभा में पारित होना था। ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारतीय संघ्‍ीय व्‍यवस्‍था में राज्‍यसभा को कुछ मामलों में शक्तिशाली माना जाता है संविधान संधोधन एक ऐसी ही प्रक्रिया है। इसी संदर्भ में वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक को आगे उच्‍च सदन में भेजा गयाए जहां राज्‍यसभा में कुछ संशोधनों का सुझात दिया गया तथा 3 अगस्‍त 2016 को विधेयक जास तो जुआ लेकिन संशोधनों के साथ। राज्‍य सभा अभी तक 2.3 मामलों में अड़ी रही जिसमें संशोधनों को शामिल करने के बाद ही पास किया है इसमें से एक जीएसटी का मुद्दा रहा।

बता दें कि इससे पहले पंचायती राज बिल पर कुछ सुझावों को शामिल करने के लिए राज्‍यसभा अड़ गयी थी और सरकार को इसे दिये गये सुझावों को शामिल करते हुए लागू करना पड़ा। 8 अगस्‍त 2016 को वह दिन आ गया जब वस्‍तु और सेवा कर विधेयक को संसद के निम्‍न सदन में अंतिम रूप से पारित किया गया। बहुत अटकलों के बाद 101वें संविधान संशोधन अधिनियम का यह रूप इसको राष्‍ट्रपति की स्‍वीकृति मिलने के बाद प्राप्‍त हुआ। सफर यहीं खत्‍म नहीं हुआ इसको लाने से पहले केंद्र सरकार को एक अधिसूचना जारी करनी थीए जिसके लिए केंद्र सरकार ने 12 सितंबर 2016 को धारा नंबर 12 लागू किया गयाए जिसके तहत जीएसटी काउंसिल का गठन किया गया। जुलाई 2017 को देश में जीएसटी लागू कर दिया गया। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में इतना बड़ा सुधार लाने के पीछे कई मकसद थे। कर लगाने की जो प्रक्रिया रही थी तह बहुत ही जटिल थी और इसको ध्‍यान में रखते हुए यह सुनिश्चित किया गया कि कर व्‍यवस्‍था की जटिलता को समाप्‍त किया जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में कर की ऐसी व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता थी जो आने वाले समय में व्‍यापार और कारोबार को ज्‍यादा से ज्‍यादा फायदा पहुंचा सके। व्‍यापार में प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ाये इसके साथ ही उसकी लागत को प्रभाती तथा तुलनात्‍मक बनाये।

 

जीएसटी को सहकारी संघवाद का सबसे अच्‍छा उदाहरण बताया जा रहा है अगर धरातल स्‍तर पर देखा जाये तो इसकी सार्थकता सिद्ध भी होती है। भारतीय संघीय व्‍यवस्‍था में जिस पकार शक्तियों का बंटवारा केंद्र और राज्‍यों के बीच किया गया हैए उससे यह समझा जा सकता है भारत की संघीय व्‍यवस्‍था अपने आप में अनूठी है। मजबूत केंद्र के साथ्‍.साथ राज्‍यों को भी कम नहीं आंका गया है। इसी संदर्भ में केण्सीण् व्‍हेयर ने यहां तक कहा कि भारतीय संविधान अर्द्ध संघीय है। ग्रेनविल आंस्टिन कहते हैं कि यह सहकारी संघ व्‍यवस्‍था है। यही नहीं भीमराव अंबेडकर जी ने संघीय व्‍यवस्‍था को स्‍पष्‍ट किया है कि संघीयता का मौलिक सिद्धांत ही यह है कि ऐसा कोई भी नियम या कानून नहीं बनाया जा सकता जिससे केंद्र तथा राज्‍यों में मतभेद की स्थिति उत्‍पन्‍न हो। वर्तमान में अब जब जीएसटी का मुद्दा लें तो। जुलाई के पहले केंद्र और राज्‍यों में कर प्रणाली को लेकर कहीं.कहीं गतिरोध उत्‍पन्‍न होता रहा है तथा कर की जटिलता को लेकर परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। राज्‍यों के साथ इसी गतिरोध को दूर करने तथा कर प्रणाली को सरल बनाने के लिए देश में जीएसटी को लागू किया गया। एक कर एक देश का नारा दिया गया जिससे देश संगठित होकर विकास की ओर अग्रसर हो।

 

केन्‍द्र और राज्‍यों की इकाइयों के मध्‍य समन्‍वय स्‍थापित करने के लक्ष्‍य से सहकारी संघबाद पर जोर दिया जा रहा है क्‍योंकि भारत में 29 राज्‍य और 7 केंन्‍द्र शासित प्रदेश हैं जिनमें से लगभग आधे से ज्‍यादा राज्‍यों में भाजपा समर्थित सरकार है तथा अन्‍य राज्‍यों में विरोधी दलों द्वारा समर्थित सरकारें है। यहां यह बात ध्‍यान देने योग्‍य है कि जीएसटी को पूरे देश में लागू करने एवं उसको सफल बनाने के लिए संघ की सभी इकाइयों द्वारा इसको लागू करने की आवश्‍यकता है जिसके कारण सहकारी संघवाद परिचर्चा का विषय बना हुआ है। उदाहरणस्‍वरूप दिल्‍ली और पश्चिम बंगाल में विरोधी दलों वाली सरकारें हैं तथा उनका सहयोग पाने के लिए सहकारी संघवाद शब्‍दावली का प्रयोग किया जा रहा है। ज्ञात हो कि भारतीय संघीय शासन व्‍यवस्‍थां राज्‍यों के साथ हो रही थीं जीएसटी आने के बाद कुछ परेशानियां राज्‍यों के साथ हो रही थीं जीएसटी आने के बाद कुछ अनुच्‍छेदए जो संविधान में निर्दिष्‍ट है उनको संशोधित तथा कुछ जोड़े भी गये हैं।

 

निष्कर्षः

इस प्रकार इन तथ्यो के अध्ययन के बाद यह कहा जा सकता है कि जीएसटी कें लागू होने के बाद केन्द्रण् राज्य सम्बन्धों में परिवर्तन आना स्वाभाविक हैए परन्तु यह परिवर्तन किस दिशा में जायेगा । यह कह पाना अभी संभव नहीए परन्तु यह कहा जा सकता है किं इससें दों स्थितियां उत्पन्न होगीः

 

१ संघीय सरकार के पक्ष में आर्थिक शक्तियों का सुझाव

२ राज्यों की आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भरता

 

यद्यपि पहले की ही संभावना अधिक शक्तिशाली प्रतीत होती हैए क्योकि हमारा संविधान एंव संवैधानिक व्यवस्था स्वयं संघ की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।

 

संदर्भः

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4.        Goods and Services Tax (2011): “A Gorilla, Chimpanzee or a Genus Like ‘Primates’?” Economic and Political Weekly, vol 44, No 7, pp 43-48.

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Received on 22.12.2020            Modified on 25.12.2020

Accepted on 29.12.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):231-234.